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सोने से पहले की कहानी · 4–8 वर्ष

आदा और बरसाती दिन की रेल

बारिश आदा की पिकनिक की योजना बदल देती है। लकड़ी की रेल, कागज़ का रास्ता और दादाजी का शांत साथ एक नई यात्रा के लिए जगह बनाते हैं। निराशा को गायब मानने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

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आदा हल्के रंग के गलीचे पर दादाजी के पास बैठी बरसाती खिड़की देखती है; पास के बक्से में लाल लकड़ी का इंजन और दो नीले डिब्बे हैं

पिकनिक को इंतज़ार करना पड़ा

आदा ने पिकनिक की जगह चुन ली थी: बत्तखों वाले तालाब के पास, चौड़े पेड़ के नीचे। उसने सफ़र के लिए कागज़ का छोटा टिकट भी बनाया था। मगर दोपहर के खाने के बाद बारिश ने खिड़की पर चाँदी की लकीरें सिल दीं। बाहर रास्ते पर पानी के छोटे गड्ढे चमक रहे थे।

“आज पिकनिक घर में करेंगे,” दादाजी ने कहा। आदा गलीचे पर बैठ गई और ठुड्डी हथेलियों में रख ली। “मुझे तो तालाब जाना था,” उसने कहा। कागज़ का टिकट पास पड़ा था। अब उसे कहीं नहीं जाना था।

बस शांत साथ

“तुम चाहती हो कि मैं साथ बैठूँ, या थोड़ा अकेले शांत रहना है?” दादाजी ने पूछा। “साथ बैठिए,” आदा बोली। “लेकिन मुझे खुश करने वाला गाना मत गाइएगा।” दादाजी उसके पास बैठ गए। उन्होंने गाना नहीं गाया। कुछ देर दोनों ने काँच पर एक बूँद को दूसरी बूँद तक पहुँचते देखा।

आदा के पैर के पास खिलौनों का बक्सा था। उसमें लाल लकड़ी का इंजन और दो नीले डिब्बे इंतज़ार कर रहे थे। उसने इंजन बाहर निकाला। उसके पहिए गलीचे पर धीमे से चले। “यह रेल तो कहीं जा सकती है,” वह आखिर बोली। “भले हम तालाब न जा सकें।”

दादाजी देखते हैं जब आदा भूरे कागज़ की रंगीन रेखा पर खिलौना रेल चलाती है; पास नीले कपड़े का तालाब और लकड़ी की बत्तख है

एक रेखा बनी यात्रा

दादाजी ने चित्र बनाने वाले कागज़ की चौड़ी पट्टी खोली। आदा ने भूरी मोम की पेंसिल से एक टेढ़ी-मेढ़ी रेखा बनाई, जो एक छोर से दूसरे छोर तक गई। “यह हमारा रास्ता है,” उसने तय किया। टिकट पर भी एक छोटा घुमाव बनाया। अब वह इस यात्रा का टिकट था।

दादाजी ने रेखा के पास मुड़ा हुआ नीला कपड़ा रखा। “यह क्या हो सकता है?” उन्होंने पूछा। “तालाब,” आदा बोली। “बहुत मुलायम तालाब।” उसने अपनी लकड़ी की बत्तख ढूँढ़कर नीले पानी के पास रखी। रेल को घूमने की पहली जगह मिल गई थी।

छप-छप स्टेशन

“छप-छप स्टेशन!” आदा ने धीमी आवाज़ में घोषणा की। लकड़ी की बत्तख इंतज़ार कर रही थी, हालाँकि वह टिकट भूल गई थी। “आज बत्तखें बिना टिकट चल सकती हैं,” आदा ने तय किया। उसने आखिरी नीले डिब्बे के पास थोड़ी जगह खाली की, ताकि बत्तख रेल को देख सके।

दादाजी ने हैरान बत्तख की छोटी-सी आवाज़ निकाली। आदा ने उससे कहीं बड़ी आवाज़ में जवाब दिया। फिर वह रुककर सुनने लगी। असली बारिश अभी भी खिड़की थपथपा रही थी। उनका काल्पनिक तालाब बाहर वाले तालाब की जगह नहीं ले रहा था। वह बस गलीचे पर एक और जगह थी, जहाँ बत्तख की बहुत बड़ी आवाज़ भी समा सकती थी।

कागज़ का रास्ता गेरुए कुशन की पहाड़ी के चारों ओर मुड़ता है; पास आदा, दादाजी और पिकनिक की छोटी ट्रे हैं

रास्ते में पहाड़ी

एक गेरुआ कुशन पहाड़ी बन गया। आदा रेल को उसके पास लाई और रुक गई। कागज़ की रेखा सीधे जाती थी, पर बीच में पहाड़ी आ गई थी। “इसे हटा सकते हैं,” दादाजी ने सुझाव दिया। आदा ने कुशन को देखा। “या रेल इसके चारों ओर जा सकती है।”

उसने पहली रेखा के पास एक बड़ा घुमाव बनाया। “घुमाव वाला दूसरा रास्ता,” दादाजी बोले। आदा ने नए रास्ते पर इंजन चलाया और नीले डिब्बे उसके पीछे चले। किसी को ऊपर नहीं चढ़ना पड़ा। दूसरी तरफ़ पहुँचकर आदा ने पीछे देखा। उनका रास्ता लंबा हो गया था और अब उसमें एक सुंदर मोड़ भी था।

खिड़की की पिकनिक

वे पिकनिक खिड़की के पास ले आए: दो कप, छोटी ट्रे और दो प्लेटों में ब्रेड। रेल कुशन की पहाड़ी के पास रुक गई। बाहर बगीचे के पेड़ पर एक चिड़िया ने अपने पंखों से बारिश झाड़ी। अंदर आदा ने टिकट के किनारे एक और छोटा घुमाव बना दिया।

“मुझे अब भी बाहर जाना था,” उसने दादाजी से कहा। “मुझे पता है।” “और छप-छप स्टेशन भी अच्छा लगा।” “मुझे भी।” कमरे में दोनों बातों के लिए जगह थी। किसी एक को बाहर धकेलने की ज़रूरत नहीं थी। दोनों धीरे-धीरे खाते रहे। काँच पर बूँदें मिलतीं और नीचे फिसल जातीं।

पीले पजामे में आदा हल्की रज़ाई के नीचे आराम करती है और दादाजी शुभरात्रि कहते हैं; नीची शेल्फ पर रेल और घुमावदार रेखा वाला टिकट है

रेल खड़ी करने की जगह

बाद में आदा ने अपना पीला पजामा पहन लिया। कागज़ वाला सफ़र सुबह तक बैठक के गलीचे पर रह सकता था। वह इंजन और दोनों डिब्बे अपने बिस्तर के पास की नीची शेल्फ पर ले आई। लकड़ी के पहियों ने आखिरी बार हल्की-सी आवाज़ की।

“अब रेल कहाँ रुकती है?” दादाजी ने पूछा। “शुभरात्रि स्टेशन पर,” आदा बोली। उसने इंजन के पीछे डिब्बे खड़े किए और पास घुमावदार रेखा वाला टिकट रख दिया। रास्ता अधूरा होने से रेल को लगातार चलते रहना ज़रूरी नहीं था। कल एक और स्टेशन के लिए जगह मिल जाएगी।

सफ़र भी आराम कर सकता है

दादाजी ने आदा को हल्की रज़ाई ओढ़ाई। तकिए से उसे लाल इंजन दिख रहा था। दोनों नीले डिब्बे चुपचाप इंतज़ार कर रहे थे। बंद खिड़की के बाहर बारिश अब हल्की टप-टप बन गई थी। “शायद किसी और दिन असली तालाब जा सकें,” आदा बुदबुदाई।

“शायद,” दादाजी बोले। “हम साथ में मौसम देखेंगे।” आदा ने कागज़ की रेखा, बत्तख और पहाड़ी के पास के मोड़ के बारे में सोचा। वह वहाँ नहीं पहुँची थी जहाँ जाने की योजना बनाई थी। वह किसी प्यारे व्यक्ति के साथ कहीं और घूम आई थी। शुभरात्रि स्टेशन पर छोटी रेल आराम कर रही थी। आदा भी।

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देखें और सीखें

नए शब्द

रास्ताएक जगह से दूसरी जगह जाने का मार्ग
डिब्बारेल का वह हिस्सा जो इंजन के पीछे चलता है
घुमावरास्ते का वह मोड़ जहाँ दिशा बदलती है
स्टेशनवह जगह जहाँ रेल रुकती है

साथ सोचें

पढ़ने के बाद बात करें

  1. आदा ने दादाजी से कैसा साथ माँगा?
  2. कौन-सी रोज़मर्रा की चीज़ें कल्पना के सफ़र में नई जगहें बन गईं?
  3. कुशन बीच में आया तो आदा ने रास्ता कैसे बदला?
  4. मन हो तो इस रेल के लिए कौन-सा नया स्टेशन सोचोगे?
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