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सोने की कहानी · 4–8 वर्ष

लूमी और कल की छोटी डिबिया

अधूरी कागज़ की नाव, एक चुहिया दोस्त और लकड़ी की डिबिया लूमी को अपना प्यारा विचार सँभालकर आराम करना सिखाते हैं।

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सूरज ढलते समय आरामदेह घर में अधूरी नीली कागज़ की नाव के पास लूमी और छोटी धूसर चुहिया

आखिरी तह

डूबते सूरज ने लूमी की मेज़ पर शहद जैसे रंग का चौकोर उजाला बनाया। मेज़ पर नीले कागज़ की नाव थी। एक किनारा सीधा खड़ा था। दूसरा अभी सपाट पंख जैसा था।

“बस एक तह और,” लूमी ने कहा। उसने पंजे से कागज़ दबाया, पर कोना फिर खुल गया। उसके कानों को नींद आने लगी थी। उसके विचार को बिल्कुल नींद नहीं आ रही थी।

झंडा लेकर आई दोस्त

छोटी धूसर चुहिया हल्की बैंगनी कागज़ की पट्टी लाई। “हमारी नाव के झंडे के लिए,” उसने कहा। “कल इसे नीले कपड़े पर चला सकते हैं।”

लूमी ने ऐसी नदी सोची जो तकियों के पास से होकर कुर्सी के चारों ओर घूमती थी। “पर अभी रुक गया तो शायद भूल जाऊँ कि इसे कैसा बनाना था।” चुहिया पास बैठ गई। उसने लूमी के पंजों को जल्दी नहीं कराई।

सांझ में बगीचे के खुले दरवाज़े के पास लूमी और चुहिया को लकड़ी की छोटी डिबिया मिलती है

दरवाज़े पर एक विराम

वे बगीचे के दरवाज़े तक गए। पत्तों के ऊपर आसमान की आखिरी सुनहरी पट्टी थी। हवा ने एक सूखा पत्ता उठाया और धीरे से सीढ़ी पर रख दिया।

चुहिया ने घास की आवाज़ सुनी। लूमी ने भी। कुछ देर तक दोनों ने कुछ बनाने की कोशिश नहीं की। “मेरा विचार अभी भी यहीं है,” लूमी फुसफुसाया। चुहिया मुस्कराई। “विराम में भी।”

भूलने की डिबिया नहीं

दरवाज़े के पास लकड़ी की छोटी डिबिया थी। लूमी ने ढक्कन उठाया। उसमें नाव, कागज़ की पट्टी और शायद एक अच्छी सोच के लिए जगह थी।

“क्या यह चीज़ें रख देने की डिबिया है?” उसने पूछा। “हो सकती है,” चुहिया बोली। “या फिर उनके पास लौट आने की डिबिया।” लूमी को दूसरा उत्तर ज़्यादा अच्छा लगा। दोनों उसे मेज़ तक ले गए।

लूमी और चुहिया खुली डिबिया में अधूरी नाव, हल्की बैंगनी कागज़ की पट्टी और सूखा पत्ता रखते हैं

विचार की जगह

लूमी ने अधूरी नाव सँभालकर डिबिया में रखी। चुहिया ने बैंगनी पट्टी उसके पास रख दी। फिर लूमी ने सीढ़ी वाला सूखा पत्ता भी रखा। उसकी नोक याद दिलाती थी कि अगली तह किस कोने पर बनानी है।

“पहले यह कोना। फिर झंडा,” उसने धीरे कहा। अब पूरी नदी को दिमाग में रखना ज़रूरी नहीं था। छोटी डिबिया एक शुरुआत सँभाल सकती थी।

डिबिया क्या कर सकती थी

चुहिया ने चिकना लकड़ी का ढक्कन छुआ। “यह डिबिया हमारे लिए नाव नहीं मोड़ेगी।” लूमी हल्का हँसा। “और तकियों के चारों ओर तैरेगी भी नहीं।”

“नहीं। बस हमारी चीज़ें एक साथ रखेगी।” लूमी ने अपने पंजे देखे। वे पूरी दोपहर ध्यान से काम करते रहे थे। अब वे रुक सकते थे और विचार सुरक्षित रह सकता था। उसने धीरे से ढक्कन बंद कर दिया।

लूमी हरे कंबल के नीचे आराम करता है; पास में बंद डिबिया है और उसका मफलर खूँटी पर टँगा है

शुभ रात्रि, छोटी नाव

“शुभ रात्रि, छोटी नाव। कल देखेंगे कि तुम्हें क्या चाहिए,” लूमी बोला। चुहिया ने उसे शुभ रात्रि कहा और बगीचे की छोटी पगडंडी से घर चली गई।

लूमी ने हरा मफलर खूँटी पर टाँगा। डिबिया छोटे बिस्तर के पास रखी और मुलायम हरे कंबल के नीचे घुस गया। कमरा शांत था। मेज़ की किसी चीज़ को आज रात जवाब नहीं चाहिए था।

कल के लिए जगह

गोल खिड़की से हल्का चाँद चमक रहा था। लूमी ने नीले कपड़े की नदी सोची, फिर उस तस्वीर को छोटा और मुलायम होने दिया। शायद नाव पर झंडा लगेगा। शायद वे कोई दूसरा खेल सोचेंगे।

दोनों के लिए जगह थी। बिस्तर के पास डिबिया इंतज़ार कर रही थी। उसमें कागज़, पत्ता और एक अधूरा विचार था। लूमी की आँखें बंद हुईं। कल के लिए जगह थी। आज रात के लिए भी।

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देखें और सीखें

नए शब्द

तहकागज़ मोड़ने पर बनी हुई रेखा या मोड़
विरामथोड़ी देर के लिए काम रोकना
सँभालकरध्यान से और हल्के हाथों से
कलइस कहानी में, आज के बाद आने वाला दिन

साथ सोचें

पढ़ने के बाद बात करें

  1. लूमी को फिर कहाँ से शुरू करना है, यह कैसे याद रहा?
  2. छोटी डिबिया क्या कर सकती थी और क्या नहीं?
  3. क्या कोई विचार किसी और दिन के लिए रखना चाहोगे? बाद में नया विचार चुनना भी ठीक है।
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